Waqf Bill Nitish Naidu: वक्फ बिल पर नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू ने साथ क्यों दिया? क्या उन्हें मुस्लिम वोट खिसकने का डर नहीं रहा? इसकी असली वजह भी जान लीजिए.

हाइलाइट्स
- वक्फ बिल पर पीएम मोदी का साथ देने के पीछे गठबंधन की मजबूरी और क्षेत्रीय हित.
- इन्हें लगता है कि एनडीए की ताकत मुस्लिम वोटों के नुकसान की भरपाई कर देगी.
- विपक्ष इतना ताकतवर भी नहीं कि आने वाले वक्त में इन्हें किसी तरह की दिक्कत दे पाए.
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू ने वक्फ बोर्ड (संशोधन) बिल पर पीएम नरेंद्र मोदी का साथ क्यों दिया, यह सवाल बहुत लोगों को समझ नहीं आ रहा है. क्योंकि दोनों ही नेताओं को मुस्लिम वोटरों का भारी समर्थन मिलता रहा है. इसी आधार पर विपक्ष को लग रहा था कि वक्फ जैसे संवेदनशील मसले पर ये पीएम मोदी का साथ तो नहीं देंगे. लेकिन दोनों नेताओं ने सबको चौंकाते हुए न सिर्फ बीजेपी का साथ दिया, बल्कि वक्फ बिल के समर्थन में ऐसी-ऐसी बातें कहीं, जो विपक्ष को चुभने वाली थीं. तो क्या मुस्लिम वोट खिसकने का डर खत्म हो गया? या फिर कहानी कुछ और है…
राजनीति के जानकारों के मुताबिक, वक्फ बिल का असर ‘तीन तलाक’ वाले मुद्दे से ज्यादा है. क्योंकि यह सीधे मुस्लिमों की संपत्ति से जुड़ा मसला है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) समेत कई मुस्लिम संगठन मुसलमानों को चेता रहे हैं कि इससे सरकार उनकी जमीन छीन लेगी. सरकार का दखल बढ़ेगा. उन्हें भरोसा था कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू इसे पास होने से रोक देंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. दोनों पार्टियों ने खुलेआम समर्थन दिया.
राजनीतिक मजबूरी या रणनीति?
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू ने इस बिल का समर्थन क्यों किया, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 17% है और आंध्र प्रदेश में यह 9% से अधिक है. दोनों राज्यों में मुस्लिम वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. वक्फ बिल के विरोध में मुस्लिम संगठनों ने नीतीश और नायडू को निशाने पर लिया था. AIMPLB ने उनसे बिल का विरोध करने की अपील की थी, और बिहार में नीतीश की इफ्तार पार्टियों का बहिष्कार भी हुआ था. फिर भी, दोनों नेताओं ने बिल का समर्थन किया, जिससे लगता है कि वे इस जोखिम को उठाने को तैयार थे. शायद नीतीश और नायडू को भरोसा है कि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण उनके खिलाफ उतना प्रभावी नहीं होगा. बिहार में नीतीश का मुकाबला तेजस्वी यादव की आरजेडी से है, जो मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण पर निर्भर है. नीतीश शायद मानते हैं कि उनका विकास का ट्रैक रिकॉर्ड और बीजेपी के साथ गठबंधन उन्हें गैर-मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा दिलाएगा, जो मुस्लिम वोटों के नुकसान की भरपाई कर देगा. नायडू के लिए भी आंध्र में वाईएसआरसीपी और कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी का साथ उनकी स्थिति को मजबूत करता है.
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1. मुस्लिम वोटों का ‘उतना’ डर नहीं
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू दोनों नेताओं ने शायद यह माना कि मुस्लिम वोटों का खिसकना अब उतना बड़ा खतरा नहीं है, जितना पहले माना जाता था. नीतीश कुमार ने बिहार में मुस्लिम समुदाय के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं, जैसे मदरसों का आधुनिकीकरण और अल्पसंख्यक कल्याण कार्यक्रम. इसी तरह, नायडू ने आंध्र प्रदेश में मुस्लिम समुदाय के लिए स्कॉलरशिप और अन्य योजनाओं को बढ़ावा दिया है. दोनों को लगता होगा कि ये कदम उनके मुस्लिम वोट बैंक को बनाए रखने में मदद करेंगे, भले ही वक्फ बिल पर उनका रुख विवादास्पद हो. दूसरा, वक्फ बोर्ड के फैसलों से तमाम मुस्लिम ही खफा हैं. जो नुकसान के बजाय फायदेमंद होने वाला है.
2. जेडीयू-टीडीपी के दबाव में बिल में बदलाव
बिल पेश होने से चंद घंटे पहले तक दोनों नेताओं की ओर से कुछ भी साफ नहीं था. फिर अचानक कहा जाने लगा कि जेडीयू ने इस बिल में कई सुझाव दिए हैं जो मुसलमानों के लिए जरूरी हैं. सरकार ने उन सभी को मान लिया है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू का सबसे बड़ा सुझाव था कि इस कानून को पीछे से लागू न किया जाए, सरकार ने उसे मान लिया. यानी कानून जब पास होगा, तभी से इसे लागू माना जाएगा. यह मैसेज मुसलमानों तक भी भेजा गया कि जेडीयू और टीडीपी ने मुसलमानों के हक में बिल में बदलाव करवा दिए हैं.
3. लाभ उठाने का मौका
जेडीयू के 12 और टीडीपी की 16 सांसदों के समर्थन से ही एनडीए की सरकार चल रही है. ऐसे में, वक्फ बिल जैसे महत्वपूर्ण बिल पर गठबंधन से अलग रुख अपनाना नीतीश और नायडू के लिए जोखिम भरा हो सकता था. गठबंधन धर्म निभाना उनकी प्राथमिकता रही होगी, क्योंकि इससे उनकी सौदेबाजी की ताकत बनी रहती है. लाभ उठाने का मौका है.
4. क्षेत्रीय राजनीति की मजबूरियां
नीतीश कुमार बिहार में लंबे समय से सुशासन और विकास के एजेंडे पर चलते रहे हैं. मुस्लिम वोट उनके लिए अहम हैं, लेकिन बीजेपी के साथ गठबंधन उनकी सरकार की स्थिरता का आधार है. वक्फ बिल का समर्थन कर उन्होंने बीजेपी के साथ वफादारी दिखाई, जिससे बिहार में उनकी सरकार को कोई खतरा न हो. वहीं, चंद्रबाबू नायडू के लिए आंध्र प्रदेश में विकास और केंद्र से आर्थिक मदद प्राथमिकता है. टीडीपी ने बिल का समर्थन करते हुए कहा कि वे मुस्लिम समुदाय के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन केंद्र के साथ सहयोग उनके राज्य के लिए फायदेमंद है.